मातृत्व का सुख
              १
कनक छड़ी सी कामिनी,पा कर पति का प्यार
लगी विकसने दिनों दिन ,मिला प्रीती  आहार
मिला प्रीती आहार ,ख्याल था बड़ा फिगर का
मोटी ना हो जाए ,उसे लगता ये  डर  था
फूला पहली बार बदन तो मन मुस्काया
मिला मातृत्व और कोख में बच्चा आया
                    २
नयना थे चंचल ,चपल ,आज हुए गम्भीर
मन में घबराहट भरी,तन में मीठी पीर
तन में मीठी पीर,खुशी ममता की मन में
गिनती दिन ,कब नव मेहमान आये जीवन में
हिरणी सी थी  चाल कभी जो उछल उछल कर
एक एक पग अब रखती  वो संभल संभल कर
                    ३
धीरे धीरे बढ़ रहा , है जब तन का बोझ
खट्टा खट्टा खाएं कुछ ,मन करता है रोज
मन करता है रोज,कभी आती उबकाई
बोझिल सा तन,रहे नींद ,आँखों में छाई
इन्तजार का फल पायेगी ,सुख वो सच्चा
जब किलकारी मारेगा गोदी में बच्चा

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’

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