Archive for March, 2014

मेरे मन की भी सुन लेते


मेरे मन की भी सुन लेते

तुमने जो भी किया ,किया बस,जो आया तुम्हारे मन में ,
अपने मन की सुनी ,कभी तो,मेरे मन की भी सुन लेते

जब हम तुम थे मिले,मिल गए ,बिन सोचे और बिना विचारे
तब तुम तुम थे ,और मैं ,मैं थी,अलग अलग व्यक्तित्व हमारे
शायद ये विधि का लेखा था , किस्मत से मिल गए ,आप,हम
तुम गंगा थे,मैं जमुना थी, किन्तु हुआ जब अपना संगम
हम मिल कर एक सार हो गए ,दोनों गंगा धार हो गए ,
अपना ही वर्चस्व जमाया ,जमुना के भी कुछ गुन लेते
अपने मन की सुनी ,कभी तो ,मेरे मन की भी सुन लेते
ये सच है कि हम तुम मिल कर, विस्तृत और विराट हो गए
कितनो को ही साथ मिलाया , चौड़े अपने पाट हो गए
मैं अपने बचपन की यादें,राधा और कान्हा की बातें
वृन्दावन में छोड़ आ गयी ,तुम संग भागी ,हँसते ,गाते
पकड़ तुम्हारी ऊँगली तुम संग, चली जहां तुम मुझे ले गए,
मिलना था खारे सागर से ,किसी और का संग चुन लेते
अपने मन की सुनी कभी तो,मेरे मन की भी सुन लेते

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

Advertisements

प्यार और बीमारी


प्यार और बीमारी

दे मीठी मीठी पप्पियाँ ,बचपन से आजतक,
लोगों ने मेरे खून में मिठास बढ़ाया
तेजी से इतनी तरक्की की चढ़ी सीढ़ियां ,
धड़कन ने बढ़ कर, खून का दबाब बढ़ाया
उनसे मिलन की चाह में ,ऐसा जला बदन,
लोगों को लगा ,हमको है बुखार हो गया
जबसे है उनके साथ हमने नज़रें लड़ाई ,
ऐसी लड़ी लड़ाई है कि प्यार हो गया
यूं देखते ही देखते ,दिल का सुकून गया ,
हम सो न पाते ,रात की नींदें है उड़ गयी
रहते हैं खोये खोये हम उनके ख़याल में ,
जोड़ी हमारी ,जब से उनके साथ जुड़ गयी

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

राज़ की बात


राज़ की बात

मैं अपनी बीबी की जब खामियां उनको बताता हूँ,
वो कहती है पसंद कर ,आप ही तो मुझको लाये थे
देखने आये थे जब मुझको अपने मम्मी पापा संग ,
देख कर हमको कितने खुश हुए थे,मुस्कराये थे
कहा हमने कि बेगम , राज़ की एक बात बतलायें ,
तुम्हारी मम्मी के जलवे ,पसंद पापा को आये थे
और ये सोच करके कि मज़ा समधन का लूटेंगे ,
उन्होंने ‘हाँ’ करी और ,हम तेरे चंगुल में आये थे

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

न्यूक्लियर फॅमिली


न्यूक्लियर फॅमिली

मियां और बीबी दोनों आजकल ,इतना कमाते है
दिन भर काम करते ,रात तक हो पस्त जाते है
नहीं हिम्मत किसी में कि पकाये गर्म वो खाना ,
गरम कर माइक्रो में फ्रीज़ का ,खाना वो खाते है
नहीं है चैन ना आराम इतने व्यस्त रहते है ,
प्यार करने का बस दस्तूर वे केवल निभाते है
एक सन्डे ही मिलता है ,देर तक उठते है सो कर ,
किसी होटल में जाकर गर्म खाना ,मिल के खाते है
अगर बच्चा हुआ पैदा ,कौन, कैसे ,संभालेगा ,
इसलिए बच्चे के ही नाम से वो घबरा जाते है
लगाई उनसे उम्मीदें थी उनके मम्मी पापा ने ,
मदर और फादर डे पर ,कार्ड देकर के निभाते है
है ‘घोटू’ न्यूक्लीयर बम से खतरा सारी दुनिया को ,
मगर हम ‘न्यूक्लीयर फॅमिली’को खतरा बताते है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

सच्चा प्यार


सच्चा प्यार

कहा गदहे ने गदही से ,उठा कर प्यार से टांगें,
तेरे चेहरे में ,मुझको ,चाँद का दीदार होता है
तेरी आहट भी होती है ,महक जाती मेरी दुनिया ,
गदही बोली ये होता है जब सच्चा प्यार होता है

घोटू

युग परिवर्तन


युग परिवर्तन
हमें है याद बचपन में ,पिता से इतना डरते हम ,
कभी मुश्किल से उनके सामने भी सर उठाया था
और बच्चे आजकल के हो गये है स्मार्ट अब इतने ,
पूछते बाप से कि मम्मी को कैसे पटाया था ?

घोटू

तीन चतुष्पदियाँ


तीन चतुष्पदियाँ

बीमा
अपने संतानों के खातिर ,सोचते है कितना हम
मर के भी उनके लिए , कुछ न कुछ कर जाएँ हम
काट कर के पेट अपना ,भरते बीमा प्रीमियम
मिलेगा बच्चों को पैसा ,जब हमें ले जाए यम

फल
जिंदगी अपनी लुटाते है हम जिनकी चाह मे
जीते जी, पर बुढ़ापे में , पूछते ना वो हमें
सोचते ये देख मुझको,आम्र के तरु ने कहा ,
बोया तुम्हारे पिता ने , दे रहा हूँ , फल तुम्हे

दान पुण्य
बोला पंडित ,दान करले ,काम ये ही आयेगा
मरने पर इस पुण्य से ही,मोक्ष को तू पायेगा
मैंने सोचा जन्म अगला,मेरा सुधरे या नहीं ,
दान पाकर,जन्म पंडित का सुधर ,पर ,जाएगा

मदन मोहन बाहेती’घोटू’