आज अगर जो तुम मिल जाते …

आज अगर जो तुम मिल जाते ,दिल मेरा खिल जाता
होती दूर वेदना दिल को ,कुछ सुकून मिल जाता
शीतल मस्त पवन के झोंके से आ मुझसे मिलते ,
तप्त ह्रदय बेचैन बहुत था ,कुछ तो राहत पाता
हम पागल से इंतजारमें ,बैठे पलक बिछाए
लेकिन तुमको ना आना था ,और नहीं तुम आये
इतने बेदर्दी निकलोगे ,ये विश्वास नहीं था ,
प्रीत लगा कर ,तुमसे प्रीतम,हम कितने पछताए
ना तो होली,ना दीवाली,ना बसंत ना सरदी
हर मौसम में याद तुम्हारी ,आई मुझे बेदरदी
इतनी अगर आरजू करती ,ईश्वर भी मिल जाता,
पर तुमने तो बेगानेपन की ,सचमुच हद करदी
बहुत दिनों से तरस रही हूँ,पर अब मत तरसाओ
अब गरमी का मौसम आया,प्रीतम तुम आ जाओ
विरह ताप से सूख रही है,प्रेमलता दीवानी ,
बन कर प्यार फुहार बरस कर अब इसको सरसाओ

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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