अंकल की पीड़ा

कल तक हम नदिया जैसे थे,बहते कल कल
कलियों संग करते किलोल थे मस्त कलन्दर
कन्यायें हमसे मिलने , रहती थी बेकल
काल हुआ प्रतिकूल ,जवानी गयी ज़रा ढल
बहुत कलपता ,कुलबुल करता ,ह्रदय आजकल
कामनियां ,जब हमें बुलाती ,कह कर ‘अंकल ‘

घोटू

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