देखो ये कैसा जीवन है

गरम तवे पर छींटा जल का
जैसे  उछला उछला  करता
फिर अस्तित्वहीन हो जाता,
बस  मेहमान चंद  ही पल का  
जाने कहाँ किधर खो जाता ,
सबका ही वैसा जीवन है
देखो ये कैसा जीवन है
मोटी सिल्ली ठोस बरफ की
लोहे के रन्दे  से घिसती
चूर चूर हो जाती लेकिन,
फिर बंध सकती है गोले सी
खट्टा  मीठा शरबत डालो,
चुस्की ले, खुश होता मन है
देखो ये कैसा जीवन  है
होती भोर निकलता सूरज
पंछी संग मिल करते कलरव
होती व्याप्त शांति डालों  पर,
नीड छोड़ पंछी उड़ते  जब
नीड देह का ,पिंजरा जैसा,
और कलरव ,दिल की धड़कन है
देखो ये कैसा जीवन है

मदन मोहन बाहेती ‘घोटू’ 

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