Archive for June, 2014

सुख-दुःख


         सुख-दुःख

जवानी में होता है,सजने सँवरने का सुख
शादी करके ,अपने प्रियतम से मिलने का सुख
थोड़े दिनों बाद फिर,माँ बाप बनने का सुख
और फिर धीरे धीरे ,बच्चों के बढ़ने का सुख
बड़ी ख़ुशी चाव से ,फिर बहू लाने का सुख
और कुछ दिनों,दादा दादी,कहलाने का सुख     
इतने सुख पाते पाते,बुढ़ापा है आ जाता
जो बड़ा सताता है और कहर है ढाता
थोड़े दिनों बाद जब ,अपने देतें है भुला
शुरू हो जाता है,दुखों का फिर सिलसिला
कभी बिमारी का दुःख,कभी तिरस्कार का दुःख
बहुत अधिक चुभता है,अपनों की मार का दुःख
जीवन में सुख दुःख की,मिलावट है होती
कभी चांदनी होती,कभी अमावस है  होती

घोटू

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क्या हाल है?


         क्या हाल है?

दांत, डेंटिस्ट के भरोसे
सांस,दवाइयों के भरोसे
नज़र,चश्मे के भरोसे
वक़्त,टी. वी. के भरोसे
किससे क्या करें आस,
किसी को क्यों कोसे?
अब तो हम दोनों है,
एक दूसरे के भरोसे  
बाकी ये जीवन है ,
सिर्फ भगवान के भरोसे

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

बाकी सब ठीक है


           बाकी सब ठीक है

पंजों में सूजन है,और  दुखती  है  पिंडली
‘आर्थराइटिस ‘से, घुटनो की हालत है पतली
‘प्रोस्टेट’ बढ़ा हुआ,पाचन तंत्र  बिगड़ा है
‘गॉलब्लेडर’ में पथरी ,’किडनी’ में लफड़ा है
श्वसन में दिक्कत है ,’लंग्स में  इन्फेक्शन ‘
और नहीं करता है,’हार्ट’ ठीक से ‘फंक्शन ‘
बदन में ‘ओबेसिटी’,बढ़ा हुआ  ‘ब्लडप्रेशर’
कम है ‘विटामिन- डी ‘और अधिक है ‘शुगर ‘
बढ़ा ‘थायराइड’है,’लिवर’भी ‘वीक’  है
आँखों से कम दिखता , बाकी सब ठीक है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

उमर के साथ साथ


     उमर के साथ साथ

कभी जब उनके कन्धों की,दुपट्टा शान होता था ,
      वो चलते थे तो लहराता ,हमें वो लगती  थी तितली
खुले बादल से जब गेसू,हवा में,उनके,उड़ते थे ,
       अदा से जब वो मुस्काते  ,चमकते दांत बन बिजली
जवानी में ये आलम था ,ठुमक कर जब वो चलते थे,
        थिरकता जिस्म मतवाला  , बना  देता  था  दीवाना
उमर ने करदी ये हालत, रही ना जुल्फ काली अब ,
         पाँव में आर्थराइटिस है,बड़ा मुश्किल है  चल  पाना
मगर एक बात है अब भी,कशिश जो पहले उन में थी,
          अभी तक वो ही कायम है,लुभाती हमको उतना ही
हमारी उनकी चाहत में,न आया कोई  भी अंतर ,
            गयी बढ़ती उमर जैसे ,बढ़ा है प्यार उतना ही

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

आम की गुठली


             आम की गुठली

मैं  बूढ़ा हूँ
चूसी हुई मैं कोई आम की,गुठली सा,कचरा कूड़ा हूँ
मैं बूढा हूँ
ये सच है मैं बीज आम का,उगा आम का वृक्ष मुझी से  
विकसित होकर फूला,फैला  और हुआ फलदार मुझी से
कच्चे फल तोड़े लोगों ने, काटा और   आचार बनाया
चटनी कभी मुरब्बा बन कर ,मैं सबके ही मन को भाया
और पका जब हुआ सुनहरी ,मीठा और रसीला,प्यारा
सबने तारीफ़ करी प्यार से ,चूंस लिया मेरा रस सारा
देख उन्हें खुश,सुखी हुआ मैं ,मुर्ख न समझा नादानी में
हो रसहीन ,दिया जाऊंगा,फेंक किसी कचरे दानी  में
आज तिरस्कृत पड़ा हुआ मैं ,सचमुच  बेवकूफ पूरा हूँ
मैं बूढ़ा हूँ

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

अलग अलग धर्मस्थल


       अलग अलग  धर्मस्थल

चर्च में प्रार्थना करने ,ईसाई जाते सारे है
इबादत यीशु  की करते,बिना जूते उतारे  है
और मस्जिद में भी जब लोग जा नमाज पढ़ते है
उतारा करते है चप्पल पर, अपने पास रखते है
और मंदिर में दर्शन करने जाते  लोग  रोजाना
मगर  जूते उतारे बिन  ,मना है मंदिर में जाना
प्रार्थना प्रभु की करते ,ध्यान चप्पल में रहता है
चुरा ना कोई ले चप्पल ,यही डर मन में रहता है
नहीं होता कोई बुत मस्जिदों में,खुद अल्लाह का
मगर चर्चों में होता बुत यीशु और मरियम माँ का
और मंदिर में कितने देवता की मूर्तियां होती
रोज श्रृंगार होता ,दो समय है  आरती    होती
अन्य पूजागृहों में सिर्फ आशीर्वाद मिलता है
मगर मंदिर में आशीर्वाद संग परशाद मिलता है   
चर्च में मौन सब चुपचाप रहते ,शांति रहती है
कहीं प्रवचन ,कहीं उपदेश की बरसात बहती है
मज़ा पर मंदिरों में कीर्तन का,नाच गाने का
यहीं पर मिलता है मौका,नयी चप्पल चुराने का               

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

गयी हो जब से तुम मइके


             गयी हो जब से तुम मइके

गयी हो जब से तुम मइके,है मेरा मन नहीं लगता
विरह की वेदना सह के ,है मेरा मन नहीं लगता
नहीं तो भूख लगती है,न आता स्वाद खाने में
बना रख्खी है क्या हालत ,तुम्हारे इस दीवाने ने
कोई भी आके ये देखे कि मेरा मन नहीं लगता
गयी हो जबसे तुम मइके ,है मेरा मन नहीं लगता
करवटें बदला करता हूँ ,न ढंग से नींद आती है
तुम्हारी याद आ आ के,मुझे हरदम सताती है
तड़फता हूँ मैं रह रह के,है मेरा मन नहीं लगता
गयी जब से तुम मइके है मेरा मन नहीं लगता
तुम्हारा रूठना और रूठ के मनना ,लिपट जाना
झुक लेना वो नज़रें का,और वो’हाँ’भरी ना ना
याद आते वो क्षण बहके ,है मेरा मन नहीं लगता
गयी हो जबसे तुम मइके ,है मेरा मन नहीं लगता
जो तुम थी ,जिंदगानी थी ,सभी सूना है बिन तेरे
आजकल मैं अकेला हूँ,मुझे  तन्हाई  है   घेरे
कभी दिन रात थे महके,है मेरा मन नहीं लगता
गयी हो जब से तुम मइके ,है मेरा मन नहीं लगता

मदन मोहन बाहेती’घोटू’