Archive for January, 2015

प्यार का अंदाज


प्यार का अंदाज

हमारे प्यार करने पर ,गज़ब अंदाज है उनका,
दिखाती तो झिझक है पर,मज़ा उनको भी आता है
कभी जब रूठ वो जाते,चाहते हम करें मिन्नत,
वो मुस्काते है मन में जब,उन्हें जाया मनाता है
संवर कर और सज कर जब ,पूछते,कैसे लगते है,
समझते हम निमंत्रण है,रहा हमसे न जाता है
उन्हें बाहों में भर कर के,हम उन्हें प्यार जब करते,
खफा होते जब ,होठों से , लिपस्टिक छूट जाता है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

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सुलहनामा -बुढ़ापे में


सुलहनामा -बुढ़ापे में

हमें मालूम है कि हम ,बड़े बदहाल,बेबस है,
नहीं कुछ दम बचा हम में ,नहीं कुछ जोश बाकी है ,
मगर हमको मोहब्बत तो ,वही बेइन्तहां तुमसे ,
मिलन का ढूंढते रहते ,बहाना इस बुढ़ापे में
बाँध कर पोटली में हम,है लाये प्यार के चांवल,
अगर दो मुट्ठी चख लोगे,इनायत होगी तुम्हारी,
बड़े अरमान लेकर के,तुम्हारे दर पे आया है ,
तुम्हारा चाहनेवाला ,सुदामा इस बुढ़ापे में
ज़माना आशिक़ी का वो ,है अब भी याद सब हमको,
तुम्हारे बिन नहीं हमको ,ज़रा भी चैन पड़ता था ,
तुम्हारे हम दीवाने थे,हमारी तुम दीवानी थी,
जवां इक बार हो फिर से ,वो अफ़साना बुढ़ापे में
भले हम हो गए बूढ़े,उमर तुम्हारी क्या कम है ,
नहीं कुछ हमसे हो पाता ,नहीं कुछ कर सकोगी तुम ,
पकड़ कर हाथ ही दो पल,प्यार से साथ बैठेंगे ,
चलो करले ,मोहब्बत का ,सुलहनामा ,बुढ़ापे में

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

रेखा


रेखा
इधर उधर जो भटका करती ,रेखा वक्र हुआ करती है
परिधि में जो बंध कर रहती ,रेखा चक्र हुआ करती है
कितने ही बिंदु मिलते है ,तब एक रेखा बन पाती है
अलग रूप में,अलग नाम से ,किन्तु पुकारी सब जाती है
अ ,आ,इ ,ई ,ए ,बी ,सी ,डी ,सब अपनी अपनी रेखाएं
रेखाएं आकार अगर लें ,हंसती, रोती छवि बनाये
संग रहती पर मर्यादित है, रेल पटरियों सी रेखाएं
भले कभी ना खुद मिल पाती ,कितने बिछुड़ों को मिलवाए
कितनी बड़ी कोई रेखा हो ,वो भी छोटी पड़ जाती है
उसके आगे ,उससे लम्बी ,जब रेखाएं खिंच जाती है
मर्यादा की रेखाओं में , ही रहना शोभा देता है
लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन ,सीता हरण करा देता है
इन्सां के हाथों की रेखाओं में उसका भाग्य लिखा है
नारी मांग ,सिन्दूरी रेखा में उसका सौभाग्य लिखा है
चेहरे पर डर की रेखाएं ,तुमको जुर्म बता देती है
तन पर झुर्री की रेखाएं, बढ़ती उम्र बता देती है
सबसे सीधी रेखा वाला ,रस्ता सबसे छोटा होता
सजा वक्र रेखाओं में जो ,नारी रूप अनोखा होता
जब भी पड़े गुलाबी डोरे जैसी रेखाएं आँखों में
मादकमस्ती भाव मिलन का,तुमको नज़र आये आँखों में
कुछ रेखा ‘भूमध्य ‘और कुछ रेखा ‘ कर्क’ हुआ करती है
इधर उधर जो भटका करती ,रेखा वक्र हुआ करती है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

ये बीबियाँ


ये बीबियाँ

पति भले ही स्वयं को है सांड के जैसा समझता ,
पत्नी आगे गऊ जैसी ,आती उसमे सादगी है
पति को किस तरह से वो डांट कर के रखा करती ,
आइये तुमको बताते ,उसकी थोड़ी बानगी है
पायलट की पत्नी अपने पति से ये बोलती है,
देखो ज्यादा मत उड़ो तुम,जमीं तुमको दिखा दूंगी
और पत्नी ‘डेंटिस्ट’ की ,कहती पति से चुप रहो तुम,
वर्ना जितने दांत तुम्हारे,सभी मै हिला दूंगी
प्रोफ़ेसर की प्रिया अपने पति को यह पढ़ाती है,
उमर भर ना भूल पाओगे ,सबक वो सिखाउंगी
और बीबी एक्टर की ,रोब पति पर डालती है ,
भूलोगे नाटक सभी जब एक्टिंग मै दिखाउंगी
सी ए की पत्नी पति से कहती है कि माय डीयर,
मेरे ही हिसाब से ,रहना तुम्हे है जिंदगी भर
वरना तुम्हारा सभी हिसाब ऐसा बिगाड़ूगीं ,
कि सभी ‘बेलेंस शीटें ‘तुम्हारी हो जाए गड़बड़
पत्नी ने इंजीनियर की ,समझाया अपने पति को,
टकराना मुझसे नहीं तुम,पेंच ढीले सब करूंगी
‘इंटेरियर डिजाइनर ‘की प्रियतमा उससे ये बोली
मुझसे जो पंगा लिया ,एक्सटीरियर बिगाड़ दूंगी
नृत्य निर्देशक कुशल है हुआ करती हर एक बीबी,
जो पति को उँगलियों के इशारों पर है नचाती
उड़ा करते है हवा में ,घर के बाहर जो पतिगण ,
घर में अच्छे अच्छे पति की,भी हवा है खिसक जाती

मदन मोहन बाहेती’घोटू’