रेखा


रेखा
इधर उधर जो भटका करती ,रेखा वक्र हुआ करती है
परिधि में जो बंध कर रहती ,रेखा चक्र हुआ करती है
कितने ही बिंदु मिलते है ,तब एक रेखा बन पाती है
अलग रूप में,अलग नाम से ,किन्तु पुकारी सब जाती है
अ ,आ,इ ,ई ,ए ,बी ,सी ,डी ,सब अपनी अपनी रेखाएं
रेखाएं आकार अगर लें ,हंसती, रोती छवि बनाये
संग रहती पर मर्यादित है, रेल पटरियों सी रेखाएं
भले कभी ना खुद मिल पाती ,कितने बिछुड़ों को मिलवाए
कितनी बड़ी कोई रेखा हो ,वो भी छोटी पड़ जाती है
उसके आगे ,उससे लम्बी ,जब रेखाएं खिंच जाती है
मर्यादा की रेखाओं में , ही रहना शोभा देता है
लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन ,सीता हरण करा देता है
इन्सां के हाथों की रेखाओं में उसका भाग्य लिखा है
नारी मांग ,सिन्दूरी रेखा में उसका सौभाग्य लिखा है
चेहरे पर डर की रेखाएं ,तुमको जुर्म बता देती है
तन पर झुर्री की रेखाएं, बढ़ती उम्र बता देती है
सबसे सीधी रेखा वाला ,रस्ता सबसे छोटा होता
सजा वक्र रेखाओं में जो ,नारी रूप अनोखा होता
जब भी पड़े गुलाबी डोरे जैसी रेखाएं आँखों में
मादकमस्ती भाव मिलन का,तुमको नज़र आये आँखों में
कुछ रेखा ‘भूमध्य ‘और कुछ रेखा ‘ कर्क’ हुआ करती है
इधर उधर जो भटका करती ,रेखा वक्र हुआ करती है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

ये बीबियाँ


ये बीबियाँ

पति भले ही स्वयं को है सांड के जैसा समझता ,
पत्नी आगे गऊ जैसी ,आती उसमे सादगी है
पति को किस तरह से वो डांट कर के रखा करती ,
आइये तुमको बताते ,उसकी थोड़ी बानगी है
पायलट की पत्नी अपने पति से ये बोलती है,
देखो ज्यादा मत उड़ो तुम,जमीं तुमको दिखा दूंगी
और पत्नी ‘डेंटिस्ट’ की ,कहती पति से चुप रहो तुम,
वर्ना जितने दांत तुम्हारे,सभी मै हिला दूंगी
प्रोफ़ेसर की प्रिया अपने पति को यह पढ़ाती है,
उमर भर ना भूल पाओगे ,सबक वो सिखाउंगी
और बीबी एक्टर की ,रोब पति पर डालती है ,
भूलोगे नाटक सभी जब एक्टिंग मै दिखाउंगी
सी ए की पत्नी पति से कहती है कि माय डीयर,
मेरे ही हिसाब से ,रहना तुम्हे है जिंदगी भर
वरना तुम्हारा सभी हिसाब ऐसा बिगाड़ूगीं ,
कि सभी ‘बेलेंस शीटें ‘तुम्हारी हो जाए गड़बड़
पत्नी ने इंजीनियर की ,समझाया अपने पति को,
टकराना मुझसे नहीं तुम,पेंच ढीले सब करूंगी
‘इंटेरियर डिजाइनर ‘की प्रियतमा उससे ये बोली
मुझसे जो पंगा लिया ,एक्सटीरियर बिगाड़ दूंगी
नृत्य निर्देशक कुशल है हुआ करती हर एक बीबी,
जो पति को उँगलियों के इशारों पर है नचाती
उड़ा करते है हवा में ,घर के बाहर जो पतिगण ,
घर में अच्छे अच्छे पति की,भी हवा है खिसक जाती

मदन मोहन बाहेती’घोटू’

नींद क्यों आती नहीं


नींद क्यों आती नहीं

आजकल क्या हो गया है रात भर ही ,
उचट जाती ,नींद क्यों आती नहीं है
कभी दायें,कभी बांयें ,करवटें भर
कभी तकिये को दबाता,बांह में भर
तड़फता रहता हूँ सारी रात भर ,पर,
भाग जाती,नींद क्यों आती नहीं है
उचट जाती ,नींद क्यों आती नहीं है
रात की सुनसान सी तन्हाइयों में
भावनाओं की दबी गहराइयों में
कभी चादर ,कम्बलों,रजाइयों में ,
लिपट जाती,नींद क्यों आती नहीं है
उचट जाती,नींद क्यों आती नहीं है
न तो चिंता से ग्रसित ना कोई डर है
न हीं कोई बुरी या अच्छी खबर है
कितने ही अनजान सपनो का सफर है
भटक जाती ,नींद क्यों आती नहीं है
उचट जाती,नींद क्यों आती नहीं है
फेर मे ननयान्वे के रहा फंस कर
रह न पाया ,जिंदगी भर स्वार्थ तज कर
कुटिलता की जटिलता में बस उलझ कर
छटपटाती ,नींद क्यों आती नहीं है
उचट जाती ,नींद क्यों आती नहीं है

मदन मोहन बाहेती”घोटू’


इन्तजार
थे बच्चे भूख जब लगती ,हम रोते और मचलते थे,
दूध अम्मा पिलाएगी ,यही इन्तजार करते थे
बड़े होकर गए स्कूल,न मन लगता पढाई में ,
बजे कब छुट्टी की घंटी,यही इन्तजार करते थे
मोहब्बत की जवानी में,किसी के प्यार में डूबे,
हमेशा माशुका से मिलन का, इन्तजार करते थे
गृहस्थी का पड़ा जब बोझ,तो फिर मुश्किलें आई,
कभी आएंगे अच्छे दिन,यही इन्तजार करते थे
रहा इन्तजार जीवन भर,कभी इसका,कभी उसका ,
सिलसिला अब बुढ़ापे में ,भी वो का वो ही जारी है
जिंदगी के सफर का अब,अंत नजदीक आने को ,
न जाने मौत कब आये,उसी की इंतजारी है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’


मोमबत्ती जल रही है

आजकल इस देश में क्या हो रहा है,
नहीं कोई की समझ में आ रहा है
लोग कहते हम तरक्की कर रहे है,
रसातल पर देश लेकिन जा रहा है
दो बरस की नन्ही हो मासूम बच्ची ,
या भले बुढ़िया पिचासी साल की है
हो रही है जबरजस्ती सभी के संग ,
दरिंदों के हाथों ना कोई बची है
पाशविक अपनी पिपासा पूर्ण करके ,
मार देते,पेड़ पर लटका रहे है
आजकल तो इसतरह के कई किस्से,
रोज ही सबकी नज़र में आरहे है
कोई साधू कर रहा है रासलीला,
कोई नेता ,लड़कियों को रौंदता है
और सुरक्षा के लिए तैनात है जो,
पुलिसवाले ,थाने में करते खता है
नौकरी का देके लालच कोई लूटे,
कोई शादी का वचन दे और भोगे
कोई शिक्षागृहों में कर जबरजस्ती,
खेलता है नन्ही नन्ही बच्चियों से
मामला जब पकड़ता है तूल ज्यादा,
कान में सरकार के जूँ रेंगती है
दे देती मुआवजा कुछ लाख रूपये ,
अफसरों को ट्रांसफर पर भेजती है
नेता करने लगते है बयानबाजी,
देश है इतना बड़ा ,क्या क्या करें हम
अपराधी है अगर नाबालिग बचेगा,
इस तरह अपराध क्या होंगे भला कम
आज ये हालात है अस्मत किसी की,
किस तरह से भी सुरक्षित है नहीं अब
किस तरह इस समस्या का अंत होगा,
किस तरह हैवानगी यह रुकेगी सब
रोज ही ये वारदातें हो रही है ,
और मानवता सिसकती रो रही है
और नेता सांत्वना बस दे रहे है,
सभी शासन की व्यवस्था सो रही है
देश के नेता पड़े कर बंद आँखें,
जागरूक जनता प्रदर्शन कर रही है
किन्तु होता सिर्फ ये कि पीड़िता की,
याद में कुछ मोमबत्ती जल रही है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’


लड़ाई और प्यार

चम्मच से चम्मच टकराते,जब खाने की टेबल पर ,
तो निश्चित ये बात समझ लो,खाना है स्वादिष्ट बना
नज़रों से नज़रें टकराती,तब ही प्यार पनपता है ,
लडे नयन ,तब ही तो कोई ,राँझा कोई हीर बना
एक दूजे को गाली देते ,नेता जब चुनाव लड़ते ,
मतलब पड़ने पर मिल जाते ,लेते है सरकार बना
मियां बीबी भी लड़ते है,लेकिन बाद लड़ाई के,
होता है जब उनका मिलना,देता प्यार मज़ा दुगुना

घोटू


बूढ़ों में भी दिल होता है

होता सिर्फ जिस्म बूढा है,
जो कुछ नाकाबिल होता है
पर जज्बात भड़कते रहते,
बूढ़ों में भी दिल होता है
सबसे प्यार महब्बत करना
और हुस्न की सोहबत करना
ताक,झाँक,छुप कर निहारना
चोरी चोरी ,नज़र मारना
जब भी देखें , फूल सुहाना
भँवरे सा उसपर मंडराना
सुंदरता की खुशबू लेना
प्यार लुटाना और दिल देना
ये सब बातें, उमर न देखे
निरखें हुस्न ,आँख को सेंकें
दिल पर अपने काबू रखना ,
उनको भी मुश्किल होता है
बूढ़ों में भी दिल होता है
उनके दिल का मस्त कबूतर
उड़ता रहता नीचे , ऊपर
लेता इधर उधर की खुशबू
करता रहता सदा गुटरगूं
घरकी चिड़िया रहती घर में
खुद उड़ते रहते अम्बर मे
चाहे रहती, ढीली सेहत
पर रहती अनुभव की दौलत
काम बुढ़ापे में जो आती
उनकी दाल सदा गल जाती
दंद फंद कर के कैसे भी ,
बस पाना मंज़िल होता है
बूढ़ों में भी दिल होता है
जब तक रहती दिल की धड़कन
तब तक रहता दीवानापन
भले बरस वो ना पाते है
लेकिन बादल तो छाते है
हुई नज़र धुंधली हो चाहे
माशूक ठीक नज़र ना आये
होता प्यार मगर अँधा है
चलता सब गोरखधंधा है
भले नहीं करते वो जाहिर
अपने फ़न में होते माहिर
कैसे किसको जाए पटाया,
ये अनुभव हासिल होता है
बूढ़ों में भी दिल होता है

मदन मोहन बाहेती’घोटू’